इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन और राज्यसभा की सदस्य सुधा मूर्ति किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. उनका जीवन न सिर्फ प्रेरणादायक है बल्कि महिलाओं के लिए एक मिसाल भी है. शिक्षा, सामाजिक कार्य और परोपकार के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया है, उसकी गूंज पूरे देश में है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सुधा मूर्ति कॉलेज के दिनों से ही अपने साहस और लगन की वजह से चर्चाओं में रही हैं? उनकी पढ़ाई-लिखाई और कॉलेज लाइफ की कहानियां हर किसी को चौंका देती हैं.
सुधा मूर्ति का जन्म कर्नाटक में हुआ था. बचपन से ही वह पढ़ाई में तेज रहीं और परिवार ने हमेशा उनकी शिक्षा पर जोर दिया. उन्होंने B.V.B कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, हुबली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीई की पढ़ाई पूरी की. यह वही दौर था जब इंजीनियरिंग कॉलेजों में लड़कियों का दाखिला मिलना आसान नहीं था. सुधा मूर्ति ने इस मुश्किल को तोड़ते हुए इतिहास रचा और अपने कॉलेज की पहली महिला छात्रा बनीं. उस वक्त कॉलेज में लगभग 150 छात्र थे और अकेली सुधा मूर्ति ने लड़कों के बीच अपनी मेहनत और लगन से जगह बनाई.
गोल्ड मेडल से सम्मानित
पढ़ाई के दौरान सुधा मूर्ति ने हर परीक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन किया. उनकी मेहनत और काबिलियत देखकर उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवराज उर्स ने गोल्ड मेडल से सम्मानित किया. यह सम्मान उनके लिए सिर्फ एक मेडल नहीं बल्कि आने वाले सफर की प्रेरणा बन गया.
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टेल्को में पहली महिला इंजीनियर
पढ़ाई पूरी करने के बाद सुधा मूर्ति ने नौकरी की तलाश शुरू की. उस दौर में लड़कियों को तकनीकी नौकरियों में मौका कम मिलता था. लेकिन सुधा मूर्ति ने हार नहीं मानी और भारत की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी टेल्को (आज की टाटा मोटर्स) में नौकरी पाई. यही नहीं, वह टेल्को की पहली महिला इंजीनियर बनीं. इस कामयाबी ने महिलाओं के लिए नए दरवाजे खोले और साबित किया कि अगर हिम्मत और मेहनत हो तो कोई भी क्षेत्र लड़कियों के लिए बंद नहीं रह सकता.
इंफोसिस की शुरुआत में निभाई अहम भूमिका
सुधा मूर्ति की शादी देश के मशहूर उद्योगपति नारायण मूर्ति से हुई. नारायण मूर्ति जब इंफोसिस शुरू करने का सपना देख रहे थे, तब उन्होंने अपनी पत्नी से दस हजार रुपये उधार लिए. सुधा मूर्ति ने न सिर्फ आर्थिक मदद की बल्कि पूरे सफर में अपने पति का साथ दिया. आज इंफोसिस दुनिया की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में गिनी जाती है.
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