अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लागू करने की घोषणा की है, जो भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर रहा है. यह टैरिफ, जो भारत के रूस से तेल आयात के जवाब में लगाया गया है, भारत के $87 बिलियन के निर्यात को प्रभावित करेगा, जिसमें वस्त्र, रत्न और आभूषण, और रासायनिक उत्पाद शामिल हैं.
प्रख्यात अर्थशास्त्री और प्रोफेसर अमीर उल्लाह खान ने इस कदम को ‘आर्थिक दबाव की रणनीति’ करार दिया, जो भारत की आर्थिक संप्रभुता को चुनौती देता है. प्रो. खान के अनुसार, यह टैरिफ भारत की जीडीपी वृद्धि पर 0.2-0.4% का नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) पर, जो वस्त्र और चमड़ा जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में सक्रिय हैं.
‘मेक इन इंडिया’ अभियान कमजोर
उन्होंने कहा, ‘यह कदम भारत के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को कमजोर कर सकता है, क्योंकि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता 30-35% तक घट जाएगी.’ हालांकि, फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों को छूट दी गई है, जिससे कुछ राहत मिली है.
प्रो. खान ने बताया कि भारत के पास इस टैरिफ को कम करने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाने का विकल्प है. सबसे पहले भारत को विश्व व्यापार संगठन (WTO) में इस मुद्दे को उठाना चाहिए, क्योंकि यह टैरिफ वैश्विक व्यापार नियमों का उल्लंघन हो सकता है. दूसरा, भारत को यूरोप, खाड़ी देशों और अफ्रीका जैसे वैकल्पिक बाजारों की ओर ध्यान देना चाहिए. तीसरा, सरकार MSMEs के लिए ब्याज सब्सिडी और निर्यात ऋण गारंटी जैसे सहायता उपाय लागू कर सकती है.
व्यापारिक रणनीति को मजबूत करने की जरूरत
चीन की तुलना में भारत की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए, प्रो. खान ने कहा कि चीन की अर्थव्यवस्था और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण अमेरिका उस पर दबाव बनाने से बचता है. भारत हालांकि एक उभरती हुई शक्ति है, को अभी अपनी व्यापारिक रणनीति को और मजबूत करने की आवश्यकता है.
उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को BRICS और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों का लाभ उठाकर अपनी स्थिति को सुदृढ़ करना चाहिए. अंत में, प्रो. खान ने जोर देकर कहा कि भारत को शांत और रणनीतिक प्रतिक्रिया देनी चाहिए, ताकि दीर्घकालिक आर्थिक हितों की रक्षा हो सके.
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