PM Modi in Cyprus: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साइप्रस के अहम दौरे का समापन तुर्की से सटे डी-मिलिट्राइज जोन पहुंचकर किया है. पिछले 51 सालों से तुर्की ने साइप्रस का एक बड़ा हिस्सा कब्जा कर रखा है. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने दोनों देशों के बीच बफर जोन बना रखा है ताकि सैन्य टकराव को रोका जा सके.
पीएम मोदी ने साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स के साथ सोमवार (16 जून) की दोपहर इस डी-मिलिट्राइज जोन का दौरा किया, जिसे यूएन प्रोटेक्टेड एरिया (ग्रीन लाइन) भी कहा जाता है.
पीएम मोदी ने साइप्रस की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति जताया समर्थन
पीएम मोदी ने यहां राष्ट्रपति निकोस से तुर्की से विवाद और इस बफर जोन को लेकर चर्चा की. राष्ट्रपति निकोस ने इस बफर जोन से पीएम मोदी को तुर्की के कब्जे वाले साइप्रस को दिखाया.
पीएम मोदी ने ग्रीन लाइन पहुंचने से पहले ही राष्ट्रपति निकोस के साथ हुई प्रतिनिधिमंडल स्तर की चर्चा में साइप्रस की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपना समर्थन जताया. दोनों देशों के साझा बयान में इस बात का जिक्र किया गया. साथ ही संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत ही साइप्रस विवाद निपटाने का आह्वान किया.
1974 में दो हिस्सों में बंट गया था साइप्रस
साइप्रस में ग्रीक और तुर्क अल्पसंख्यक लोग रहते हैं. दोनों समुदायों के बीच लंबे समय से नस्लीय विवाद चला आ रहा है. साल 1974 में ग्रीक समुदाय से जुड़े लड़ाकों ने द्वीप पर तख्तापलट किया था जिसके बाद तुर्की ने तुर्क समुदाय के लोगों की रक्षा का बहाना कर द्वीप पर हमला कर दिया था. इस आक्रमण के बाद साइप्रस दो हिस्सों में बंट गया, जिनमें से एक में ग्रीक-साइप्रस सरकार है और दूसरे पर तुर्क-साइप्रस वासियों का कंट्रोल है.
पाकिस्तान का साथ देने के लिए इंस्तांबुल को माफ नहीं करेगा भारत
संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया का कोई भी देश तुर्की के इस क्षेत्र को मान्यता नहीं देता है. ऐसे में पीएम मोदी के बफर जोन का दौरा बेहद अहम हो जाता है. पहले कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने और अब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह तुर्की ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया, उसके लिए भारत कभी भी इंस्तांबुल को माफ करने वाला नहीं है.
साइप्रस में यूएन पीस कीपिंग फोर्स के पहले कमांडर थे भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल
संयुक्त राष्ट्र के आदेश पर डी-मिलिट्राइेज जोन में यूएन पीसकीपिंग फोर्स तैनात रहती है. खास बात ये है कि तुर्की से हुए सैन्य टकराव के बाद इस पीस कीपिंग फोर्स के पहले कमांडर भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल दीवान प्रेम चंद बनाए गए थे. अगले महीने यानी 20 जुलाई को तुर्की के हमले के 51 वर्ष पूरे हो रहे हैं.
रिटायरमेंट के बाद भारतीय सेना के प्रमुख जनरल केएस थिमैया ने दी थी अपनी सेवाएं
बफर जोन यानी यूएन प्रोटेक्टेड एरिया बनने से पहले भी भारत के टॉप मिलिट्री कमांडर्स ने साइप्रस की शांति के लिए अपने सेवाएं दी हैं. भारत के चर्चित थलसेना प्रमुख जनरल के. एस. थिमैया (1957-61) ने रिटायरमेंट के बाद भी साइप्रस में यूएन पीसकीपिंग फोर्स के कमांडर के तौर पर अपनी सेवाएं दी थी. 1965 में साइप्रस में तैनाती के दौरान ही उनका निधन हो गया था. यही वजह है कि साइप्रस ने वर्ष 1966 में जनरल थिमैया की याद में एक पोस्टल स्टैंप जारी किया था.